पित्र, पित्र पक्ष और श्राद्ध : अवधारणाएँ एवं सत्य

UHC ब्लॉग पर पित्रों के उपर लिखे गये इस ब्लॉग को पढने आने के लिए आप का धन्यवाद, इस ब्लॉग में पित्र एवं पित्रों से सम्बंधित समस्याओं पर बात करी गयी हैं, मगर इसका उद्देश्य किसी की व्यक्तिगत आस्था को ठेस पहुँचाना नहीं हैं, अगर आप इसमें वर्णित बातों को जीवन में उतारते हैं तो लाभ ही होगा और नहीं मानते हैं तो भी आप का जीवन आपके अनुसार चल ही रहा हैं. आप इस ब्लॉग से कितने सहमत हैं यह आप पर निर्भर करेगा, मगर हाँ यह अवश्य सत्य हैं की इसे अवधारणाओं या सुनी सुनाई बातों पर नहीं सिर्फ अनुभवजन्य तथ्यों पर ही लिखा गया हैं, साथ ही प्रयास किया गया है की लेख सरल रहे; फिर भी कोई प्रश्न हो तो आप निचे कमेन्ट बोक्स में पूछ सकतें हैं.

हिन्दू कलेंडर के अनुसार वर्तमान समय श्राद्ध का चल रहा हैं, या कहें तो पित्र पक्ष चल रहा हैं. पित्रपक्ष यानि की अपने पितरों से सम्बंधित पक्ष, और श्राद्ध के बारे में कहा जाता हैं की श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌” यानि की जिसे श्रद्धा से किया जाए वही श्राद्ध हैं.

इसे कनागत भी कहतें हैं, जब सूर्य कन्या राशी में आता है तब वह धरती के सबसे निकट होता है. विशेषकर प्रथम पन्द्रह दिन तक. सूर्य के जीवनदायी कार्य को सभी जानते हैं साथ ही सूर्य मुक्ति में भी महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता हैं. कई बार पितृ चन्द्र लोक तक ही अटक जाते हैं तब सूर्यदेव उन्हें उच्च्लोक में लातें हैं.

पित्र कौन हैं?

सामान्यता यह मान लिय जाता हैं की हमारे जितने भी पूर्वज हैं वो सभी पित्र हैं, जब की ऐसा नहीं हैं. विभिन्न योनियों की तरह पित्र भी एक योनी हैं. जब कोई इन्सान मरता हैं, मरते वक़्त उसके प्राण किस चक्र से निकले उसी के अनुसार उसकी गति होती हैं. सर्वश्रेस्ठ प्राणोत्सर्ग सहस्रार से माना गया हैं और निकृष्टतम प्राणोत्सर्ग मूलाधार से. अर्थात प्राण जितने ऊपर से गये उतना अच्छा माना गया हैं सहस्रार से हुआ यानि की मुक्ति निश्चित और मूलाधार से हुआ तो भटकना निश्चित .

पहले बड़ों द्वारा आशीर्वाद भी यही दिया जाता था की “उर्ध्वरेता भवः” अर्थात तुम्हारी उर्जा का प्रवाह ऊपर की ओर हो. (इस सब पर विस्तृत चर्चा कसी और ब्लॉग में या फ़ोरम पर )

जो आत्मा मरते ही मुक्त नहीं हुई वो मृत्यु के पश्चात प्रेत योनी को प्राप्त होती हैं और दशगात्र तक उसी योनी में रहती हैं उसके पश्चात अपने कर्मों के अनुसार आगे की यात्रा प्रारंभ करती हैं, तो वो आत्माएं जो की मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकी, अधम योनी में पहुँच गयी, जिन्होंने अब तक अगला जन्म नहीं लिया पित्र की श्रेणी में आती हैं. और संतान का कर्तव्य हैं की वो उस आत्मा को सद्गति प्रदान करने का उपक्रम करे, और कुछ ना कर सके तो उनका श्राद्ध करें जिससे उन तक तृप्ति पहुँच सके.

हम क्या करतें है??

सबने अपनी मान्यताओं अनुसार अपने अन्ध्विश्वासों के अनुसार तो कुछ ने स्वार्थवश अपने नियम या कर्मकांड बना लिए, उसी के अनुरूप वो चलते हैं और परेशान होते हैं.

कुछ लोग घर में अपने पूर्वजों के चित्र लगा देतें हैं तो कुछ इससे भी आगे उनके समक्ष नियमित दिया बत्ती प्रारंभ कर देतें हैं, कुछ और आगे बढ़ते हुए अपने मंदिर में ही उनको प्रतिष्ठित कर देतें हैं.

कुछ जातीयों में तो लोग पित्रों को गले में लटकाए फिरते हैं की मेरे पित्र हैं और मुझे कहा गया हैं की उन्हें गले में पहनो. कई लोग अपने घर या खेत में अलग से उनकी स्थापना करते है की “आदेश हुआ हैं उन्हें  स्थापित किया जाए”. वहीँ कुछ ऐसे होते हैं की कब तीसरा हो और मेरी नियमित जीवनचर्या प्रारंभ करूँ. पित्र श्रद्धा में हमारे एक वरिष्ठ मित्र ने पित्रों पर आरती की रचना भी कर दी.

हमें क्या करना चाहिए?

उपर वर्णित कोई भी कार्य चाहे कितनी अच्छी भावना से किये जा रहें हो उन्हें सही नहीं कहा जा सकता.

अब प्रश्न यह उठता हैं की क्यों??

क्योंकि हर आत्मा का पहला अधिकार होता हैं मुक्ति.

जन्म-मरण का फेर कर्म भोग के लिए हैं. कर्म मुक्त होने पर मुक्ति प्राप्त होगी, हो सकता है की किसी को फिर से जन्म भी लेना पड़े या आत्मा निम्न योनियों में भटके, मगर उपरोक्त वजहों से उन्हें कष्ट ही होगा.

नियम और कर्मकांड अपनी जगह सही हैं पर सारे नहीं, क्यूंकि चाहे हिन्दू धर्म का आधार और उसे आगे बढ़ने वाले ब्राह्मण ही हैं पर अपवाद हर जगह होतें हैं तो यहाँ भी हैं, कुछ ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थवश अपने नियम और कर्मकांड बना लिए और जब कर्मकांड टूटता है कुछ ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व पर ठेस लगती हैं की अब क्या करेंगे. यहाँ भी किसी को लगी हो तो क्षमा….

श्राद्ध पित्र shradh Pitra hindi blog हिंदी ब्लॉग

हम कर्मकांड में उलझ कर श्राद्ध की मूलधारा से विमुख हो जातें हैं कुछ दिन पहले ही एक वीडियो सोशल मिडिया पर आया जिसमे एक महाराज कोए को पकडे हुए हैं और जजमान उन्हें चरों तरफ से घेरे हुए हैं, बारी बारी से वो उन जजमानों की पत्तल/थाली में कोए से चोंच लगवा रहें है और जजमान राजी की पिताजी/माता जी/दादाजी/दादीजी…… ने भोग लगा लिया. पितरों तक तृप्ति पहुंचनी हैं किसी भी माध्यम से पहुँच जाएगी पर इस तरह कोए को पकड़ कर…..

श्राद्ध, कौवा, अन्धविश्वाश

मृतजनो के चित्र लगाने वाले उन्हें पूजने वाले अपनी जगह सही हैं उनकी भावना भी अच्छी हैं. वो उनके प्रति उनके सम्मान और प्यार के चलते ऐसा करतें हैं (कुछ अपवादों को छोड़ कर जहाँ लोग डर की वजह से करते हैं). वो ऐसा करतें हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता की वो गलत कर रहे हैं.

कैसे??

वो ऐसे की मान लीजिये आप अपने घर से सालभर के लिए बाहर गए हुए हैं, आप व्यस्त हैं या खुद को जानबूझ कर व्यस्त रखे हुए हैं की घर वालों की याद न आए.

कभी कभार कॉल पर या विडियो कॉल पर घर पर बात भी हो जाती है. एक दिन ऐसा होता हैं की आपके माँ-बाप,बीवी या बच्चे से आप बात कर रहे हैं और आपकी याद में उनकी आवाज़ भार्रा गयी या आंखे भीग गयी, सोचिये और कुछ पल के लिए खुद को उस स्थिति में महसूस करिए आपको कैसा लगेगा? कितनी तकलीफ होगी? आप कैसा महसूस करेंगे?

लगा कुछ??  यह सब होता है उस मृत आत्मा के साथ जब आप उस तस्वीर को देख कर रोते हैं , उन्हें याद करतें हैं. वो जिस भी लोक में होतें हैं उन्हें तकलीफ होती हैं. दिया करने का मतलब होता हैं की जिसके सामने आप दिया कर रहे हो उसका आवाहन कर रहे हो. तो मृतजन के सामने दिया कर के आप उनकी आत्मा को खिंच रहे हो.

एक बार एक घर को जांचने पर देखा की उसमें तस्वीरें ही तस्वीरें (कुछ और चीज़े भी थी पर उनका यहाँ उल्लेख उचित नहीं.) और उस वजह से ज़बरदस्त नकारात्मकता, जब वो सब कुछ हटा तब जा कर घरवालों को कुछ सुधार महसूस हुआ.

एक और घर पर सब कुछ सकारात्मक, परेशानी क्यूँ है कुछ समझ नहीं आ रहा था. जाते जाते उन्होंने कहा की हमारा पूजा घर इधर हैं, जैसे ही पूजा घर में घुसा फुल नेगेटिविटी. कुछ समझ नहीं आया , अचानक से ऊपर नज़र गयी दादी जी की बड़ी तस्वीर, मैंने बताया की भाई यह वजह हैं तो वो बोला की अन्दर बने मंदीर में भी 2 तस्वीरें हैं. जब उन्हें कहा की इन्हें हटा दो तो बोले की पहले भी एक दो लोगों ने हटाने को बोला अब आप कह रहे हो तो हटा देंगे.

यह सब लिखने का बस यही प्रायोजन हैं की आप लोग समझे और कर के देखे, अगर कुछ समय में फर्क न लगे तो फिर से तस्वीर लगा पा रहें हैं.

आरती इश्वर की होती है प्रियजन की नहीं, फिर भी आपकी भावना हैं और आप कर रहे हो तो उन्हें फिर से खिंचाव होगा और तकलीफ होगी.

फिर उन्हें गले में तावीज रूप में पहनने का कोई औचित्य ही नहीं, और ना ही कहीं स्थपना करने का. ऐसा कर के हम उन्हें और बंधन में बांध रहे हैं. किसके लिए? अपने स्वार्थ के लिए. जब की उनका प्रथम अधिकार मुक्ति हैं.

चलिए किसी ने कह भी दिया की आप के पूर्वज स्थापित होना चाह रहे हैं तो इस बात की क्या गारंटी की होना चाह ही रहे हैं. और होना चाह भी रहे हैं तो इस बात की क्या गारंटी है की जो स्थापित होंगे वो आप के पूर्वज ही होंगे कोई और नहीं? एसा देखने में आया हैं की लोगों ने स्थापना करवा दी और वहां कुछ स्थापित हुआ ही नहीं और यह भी की स्थापना करवाई किसकी और स्थापित कोई और हो गया.

कुछ पंथ जो की हिन्दू धर्म से निकले और कुछ पंथ जो हिन्दू धर्म से निकल कर खुद को नया धर्म कहने लगे अगर उनसे पूछें की आप लोगों में मुक्ति की क्या प्रक्रिया हैं तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता.

मगर हमारे वैदिक धर्म में सब कुछ वैज्ञानिक रूप से होते हुए भी अगर हमारे पित्र मुक्त न हो तो सही नहीं हैं. अतः हमे चाहिए की छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखते हुए अपने पित्रों को उच्च लोक में भेजने का प्रयास कर के उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए, क्यूंकि रिश्ता शारीर का होता हैं आत्मा का नहीं और फिर से कहूँगा की

“हर आत्मा का प्रथम अधिकार हैं मुक्ति”

किसी को मेरे शब्दों से तकलीफ हुई हो तो क्षमा. _/\_

2 Replies to “पित्र, पित्र पक्ष और श्राद्ध : अवधारणाएँ एवं सत्य”

  1. Nice post sir… I agree with these thoughts….

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