रिश्ता आपका, जिंदगी आपकी

रिश्ता, नाज़ुक,

रिश्ता“, एक शब्द जो हर सम्बन्ध में होता है, चाहे आप कोई भी किसी भी तरह का सम्बन्ध उठा कर देख लीजिये, कोई न कोई रिश्ता वहां होगा ही, रिश्ता वो शब्द जो सुनने में बहुत अच्छा लगता है, कोई रिश्तों में ख़ुशी ढूंढता है तो कोई ख़ुशी में रिश्ते, मगर वास्तविकता देखी जाए तो रिश्तो के कई रुप है, कई प्रकार हैं और रिश्तो में सबसे बड़ी बात यह है कि सबसे आसान है कोई रिश्ता बनाना, उससे भी आसान है किसी रिश्ते को तोड़ देना, अगर कुछ मुश्किल है तो वह है किसी रिश्ते को निभाना और यहां निभाने का मतलब रिश्ते को खींचना या ढोना नहीं है.

क्योंकि आजकल अधिकतर रिश्ते या तो खींचे जा रहे या फिर ढोए जा रहे हैं, चाहे जबरदस्ती या फिर  किसी मजबूरी की वजह से. यहाँ दोनों तरफ तरफ लोगों को पता होता है कि उनके लिए उस रिश्ते में कहीं कुछ बचा ही नहीं है. उसके बाद भी न जाने क्यूँ, किस वजह से लोग उस रिश्ते को ढोए जाते हैं, खींचे जाते हैं और दिखावे के बोझ तले दबे जाते है. इससे अच्छा है की रिश्ता कुछ समय में समाप्त कर दिया जाए.

हां कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो कि चाह कर भी खत्म नहीं किए जा सकते, इनमें वो रिश्ते हैं जो कि हम जन्म से प्राप्त करते हैं. वहां पर यह उचित है कि उस रिश्ते से किनारा कर लीया जाए बगैर इसके की रिश्ता खराब किया जाए. अब बात करते हैं दूसरे रिश्ते की जो कि हम बनाते हैं  कभी काम की वजह से तो कभी जान पहचान की वजह से. इस तरह के रिश्ते साधारण रुप से चल तो कोई दिक्कत नहीं, मगर जब इन रिश्तों में एक दूसरे का स्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए किया जाने लगता है तो रिश्ता रिश्ता नहीं रह जाता आज के युग में कोई किसी को अपने स्वार्थ के लिए एक आध बार स्तेमाल कर भी ले तो उसे नजर अंदाज किया जा सकता है, मगर कोई बार-बार किसी का स्तेमाल करके आदतन अपराधी बन जाए तब स्थिति थोड़ी नाजुक हो जाती है.

यह यूज़ एंड रियूज़ वाली बात हो जाती है, कि एक इंसान दूसरे इंसान की भावनाओं के बारे में बगैर सोचे समझे उसका स्तेमाल कर रहा है और कई बार इससे आगे हद तब हो जाती है जब वह इंसान जिसका स्तेमाल किया जा रहा है, सब कुछ जानते बुझते हुए भी अपने साथ हो रहे किसी भी प्रकार के व्यवहार का प्रतिकार नहीं करता, सब कुछ सहता जाता है. शायद इस आशा से की यह आखिरी बार हो और इस बार सामने वाला सुधर जाए या कुछ शर्मिंदा हो जाए, मगर ऐसा कभी होता नहीं या दूसरे शब्दों में वफा करने वाला करे जाए और दूसरा बेवफाई करें जाए. पर होता यह है यह है कि दोनों को इस चीज की आदत पड़ गई होती है, स्तेमाल करने वाले को स्तेमाल करने की और करवाने वाले को अपना स्तेमाल करवाने की और इस तरह इस मुद्दे में दोनों ही गलत होते है और सुधार की कोई गुंजाइश नहीं होती.

अब तक लिखी गई लिखी गई बातों का विश्लेषण करने पर यही सामने आएगा कि किसी भी रिश्ते में सबसे महत्वपूर्ण होता है आपसी समझ बनाए रखना, एक दूजे पर विश्वास करना, एक दूजे को सम्मान देना और एक दूसरे की भावनाओं की कद्र करना. मगर कई बार हम हमारे स्वार्थ में हमारी आकांक्षा पूर्ति में इतने अंधे हो जाते हैं की हमें निहित स्वार्थ के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता. हम हमारे स्वार्थ के लिए रिश्तो में साम, दाम,दंड भेद आदि का स्तेमाल शुरू कर देते हैं. हम यह नहीं सोचते कि जैसा हम आज किसी के साथ कर रहे कर रहे हैं, कल वैसा ही हमारे साथ भी हो सकता है. और निज स्वार्थ में हम यह भूल जाते हैं कि कर्म का सिद्धांत हम सब पर लागू होता है, जैसा पेड़ हम बोएँगे वैसा ही काटना होगा, इसलिए हम सबको यह याद रखना चाहिए कि रिश्तो की डोर बडी नाजुक होती है, इसे बहुत ही सावधानी से संभालना चाहिए.

रहीम दास जी ने भी कहा है कि रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो छिटकाय टूटे से फिर ना जुड़े जुड़े गांठ पड़ जाए.

आगे जिंदगी आपकी, रिश्ते आपके, मर्जी आपकी.

रिश्ता, नाज़ुक,
रिश्ते सम्हालिए

2 Replies to “रिश्ता आपका, जिंदगी आपकी”

  1. गोल्डी रॉय says: Reply

    रिस्तो को समझने के लेए लिखा गया बेहतरीन लेख नमन रहेगा भैया को

    1. धन्यवाद भाई,
      पर सिर्फ समझना ही नहीं हैं, जीवन में भी उतारना हैं.

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